वात, पित्त ओर कफ: इन आसान तरीकों से करे अपनी प्रकृति की पहेचान, और पाइए रोग से मुक्ति

अपनी प्रकृति की पहचान मनुष्य को ईश्वर ने इतनी शक्ति प्रदान की है कि वह स्वयं अपनी प्रकृति की पहचान कर अपनी कमजोर बातों का सही पता लगा सकता है। इसके बाद प्रकृति की इच्छा के अनुसार स्वस्थ तथा शान्त रहा जा सकता है। हम जिस परिवार में जन्म लेते हैं, वहां के ‘दोष’ हमारे भीतर भी आ जाते हैं। उस समय दोष पर्यावरण तथा भोजन के संदर्भ में कुछ शर्तें रखता है। यदि हम इसे पहचान कर उसका रूप बदल देते हैं तो हमें उन छोटी-मोटी स्वास्थ्य सम्बंधी मुसीबतों का सामना नहीं करना पड़ता।

वात प्रकृति: ‘वात दोष’ वायु और आकाश से बनता है। इससे शरीर का चलना-फिरना नियंत्रित होता है। जो लोग वात प्रकृति के हैं, वे दोष की पहचान आसानी से कर सकते हैं। ऐसा व्यक्ति एक जगह पर जम कर नहीं बैठ सकता। वह दिनभर कुछ न कुछ करने में विश्वास रखता है और नए-नए विचारों को कार्य के रूप में परिणत करता है। ऐसे व्यक्ति में ईर्ष्या की भावना अधिक होती है। फिर भी वह अपने को बुराइयों से बचाने की तरकीबें करता रहता है।

ऐसा व्यक्ति कोई काम नियमानुकूल नहीं करता। वह प्रायः सनकी होता है। चूंकि ऐसे व्यक्ति को अधि खाने-पीने का शौक होता है, इसलिए वह कब्ज का शिकार रहता है। उसके शरीर में वायु मौजूद रहती है जो उसकी त्वचा को शुष्क कर देती है। इसी कारण वायु प्रधान व्यक्ति की त्वचा बहुत पतली और कमजोर होती है। उसके बाल और नाखून शुष्क रहते हैं।

ऐसी प्रकृति वाले व्यक्ति की एक विशेषता यह है कि उनके हाथ की नसें फूली होती हैं। वे प्रायः कमजोर होते हैं और शारीरिक मेहनत करने से डरते हैं। ये लोग इस तरह सक्रिय रहते हैं, मानो उनके पैरों में स्प्रिंग लगे हों। यद्यपि वे बातों को जल्दी समझ लेते हैं, लेकिन याददाश्त के भुलक्कड़ होते हैं। कम नींद आना, ऐसे व्यक्तियों की पहचान है। वे जीवन में शिष्टाचार की उपेक्षा करते हैं तथा अपने प्रति की गई भलाई के लिए आभार भी नहीं मानते।

पित्त प्रकृति:  पित्त में अग्नि और जल का मेल होता है। यह गरमी को मूर्त रूप देता है और शरीर में खाई हुई वस्तुओं को पचाता है। रक्त में पित्त का स्थान संजीवित होता है। इस प्रकार पित्त प्रकृति वाले व्यक्ति की त्वचा चमकीली होती है। उसके बाल चिकने और खाल नरम होती है। जवानी में पित्त प्रधान होता है, इसलिए पित्त प्रकृति वाला व्यक्ति जवानी में जाने क्या-क्या कर डालना चाहता है। परन्तु यदि शरीर में पित्त प्रकृति बढ़ जाए तो समय से पहले झुर्रियां पड़ सकती हैं, बाल जल्दी सफेद हो सकते हैं। पुरुषों में पित्त प्रकृति के बढ़ने से गंजापन बढ़ सकता है। ऐसे व्यक्तियों के शरीर में तिल अधिक होते हैं। उनकी हथेलियां और तलवे सामान्यतः गरम तथा पसीने से नम रहते हैं। उनकी जीभ लाल होती है।

ऐसे लोग प्रतिभाशाली होते हैं तथा उनकी आंखों में नया कार्य करने की चमक होती है। उनकी स्मरण शक्ति तेज होती है। वे प्रायः वीर तथा साहसी होते हैं। उनके शरीर में मौजूद गरमी उनको तुरन्त क्रोधित कर देती है। लेकिन वे बहुत जल्दी शान्त भी हो जाते हैं। ऐसे लोगों में तर्कशक्ति अधिक होती है। वे अपनी तर्कशक्ति से बहुत जल्दी कोई न कोई निर्णय लेने में समर्थ होते हैं। इस स्वभाव के व्यक्ति प्रायः जोर-जोर से बोलते हैं। लेकिन उनकी बातें लोग बड़ी गौर से सुनते हैं। क्योंकि वे जो कुछ कहते हैं, उसमें सार होता है।

कफ प्रकृति: कफ पृथ्वी और जल तत्त्वों से बना है, इसलिए इसमें स्थायीपन एवं शान्ति का गुण होता है। ऐसा व्यक्ति सदा शान्त रहता है तथा 30 वर्ष की उम्र में भी बच्चे की तरह मालूम पड़ता है। वह काले बालों वाला, शान्त नेत्रों वाला, शरीर से हृष्ट-पुष्ट तथा अपनी बात पर दृढ़ रहने वाला होता है। परन्तु बच्चे में कुछ भी सीखने की प्रवृत्ति धीमी होती है। वह दूसरों की बातें बड़ी खुशी के साथ सुनता है तथा काफी संतुष्ट रहता है।

इतना सब कुछ होने पर भी ऐसे व्यक्ति का शारीरिक भार अधिक होता है। इसलिए यह कभी-कभी उसकी परेशानी का कारण बन जाता है। यद्यपि ऐसे व्यक्ति प्यार और अनुशासन में जीवित रहना पसंद करते हैं, फिर भी इधर-उधर की कठिनाइयों से बचना चाहते हैं। खाने-पीने के मामले में भी ऐसा व्यक्ति लापरवाह होता है। वह अधिक खाने की चिन्ता नहीं करता। कफ प्रकृति के लोग मन्दगति के होते हैं और बड़े धैर्य के साथ कार्य करते हैं। किसी भी काम में टांग अड़ाने के बजाय तटस्थ रहना अधिक पसंद करते हैं।

इनमें वात प्रकृति वाले व्यक्तियों के समान ओज नहीं रहता, लेकिन बात को समझकर उसे पूरा करने की शक्ति होती है। ऐसे व्यक्ति सदैव विनम्र तथा प्रसन्न रहना पसंद करते हैं। ये मित्रता निभाने में भी दृढ़ निश्चयी होते हैं। इनका नारा होता है- जियो और जीने दो।

 

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