गणतंत्र दिवस पर बजाई जाने वाली ‘Abide With Me’ धुन हटने पर जमकर सियासत, सेरेमनी का हो रहा हे भारतीयकरण…

“Abide With Me” ये ईसाई धर्म का एक लोकप्रिय भजन या प्रार्थना है. हिन्दी में इसका अर्थ होता है की मेरे साथ रहो। इसकी रचना स्कॉटलैंड के मशहूर कवि हेनरी फ्रांसिज लाइट ने आज से 202 वर्ष पहले 1820 में की थी। जब वो अपने एक मित्र से मिल कर आए थे। जो अंतिम सांसें ले रहा था। और इस भजन में इसी दुख को वर्णन किया गया है। एक लाइन में इसका सार ये है कि जीवन में, मृत्यु में, हे प्रभु तुम मेरे साथ रहो।

अंग्रेजों से आजादी के बाद जब 26 जनवरी 1950 को भारत एक गणतंत्र बना। तब भी हमारा देश अंग्रेजों की परछाई से बाहर नहीं निकल पाया। माना जाता है कि गणतंत्र दिवस समारोह में पहली बार मेरे साथ पालन करना धुन को वर्ष 1950 में शामिल किया गया। इसके पीछे केवल एक ही मकसद था और वो ये कि ये भजन महात्मा गांधी की पसंदीदा धुनों में से एक थी।

इसे गणतंत्र दिवस के समापन समारोह में इसीलिए बजाया जाता रहा है, ताकि इसके बहाने महात्मा गांधी को भी याद किया जा सके। ये धुन वर्ष 1950 से इस समारोह में बजाई जाती रही है। हालांकि वर्ष 2020 में भी इसे सूची से हटा दिया गया था। लेकिन विवाद के बाद इसे शामिल भी कर लिया गया था। Abide With Me एक मशहूर सैन्य धुन है। लेकिन भारत के संदर्भ में इसकी पहुंच बहुत कम लोगों तक है। ये धुन भारत की संस्कृति और उसकी पहचान से ज्यादा अंग्रेजी मानसिकता को दर्शाती है।

वर्ष 2012 में पहली बार इस समारोह में शहनाई का इस्तेमाल किया गया था। वर्ष 2014 में दो नई धुन बजाई गई थीं। इनमें एक थी ‘रघुपति राघव राजा राम’ और दूसरी थी, जहां डाल डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा, वो भारत देश है मेरा। इसके अलावा 2014 से पहले भी इस समारोह से विदेशी धुनों को हटाया जाता रहा है। 2012 में सात विदेशी धुनों को इसमें शामिल किया गया था। जबकि 2013 में पांच ही विदेशी धुनों को जगह मिली थी। यानी दो विदेशों धुनों को उस दौरान कार्यक्रम से हटा दिया गया था।

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